ये अंधेरा भी छँटेगा
ये कुहासा भी हटेगा
फिर दुबारा प्रात होगी
फिर हमारी बात होगी
फिर से बाँछें ये खिलेंगी
अन्त इस सूखे का होगा
फिर हरे ये पात होंगे
फिर यहाँ बरसात होगी
फिर मिटेंगी दूरियाँ ये
साथ अब फिर से मिलेगा
उलझनें फिर से मिटेंगी
फिर हमारा साथ होगा
रोशनी फिर से दिखेगी
फूल भी फिर से खिलेंगे
साँस जो रुक सी गई थी
फिर चलेगी
हाथ में फिर हाथ होगा
कदम फिर से संग चलेंगे
श्री पुनः श्री नाथ होगा।
-श्री नारायण शुक्ल, २-अक्टूबर-२०२३
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